न दो गज जमीन मयस्सर है, न उम्मीदों का आसमान मिलता है..!
हमारी तो जिंदगी सफ़र है, और मुसाफिरों को कहाँ चैन-ओ-आराम मिलता है..!!
चाहत में महज़ शिद्दत का फर्क है यारों.,
किसी को इश्क मुश्किल से., तो किसी को आसान मिलता है..!!
मुन्तज़िर-ए-महबूब हो कर, हमने भी सदियाँ गुज़ारी हैं एक लम्हे की तरह.,
और उन्हें अपनी फुरसतों से वक्त कहाँ मिलता है..!!
किसी दिल में मोहब्बत., तो किसी में मोहब्बत का निशाँ मिलता है..!!
एक बहार का मुन्तज़िर तो हर शख्स होता है.,
किसी को मगर गुलशन तो किसी को बियाबाँ मिलता है..!!
कभी-कभी बस यूँ ही जब अपने कातिलों की टोली से टकरा जाता हूँ अब..,
तो जाने क्यूँ., मुझे ज़िन्दा देख कर, मेरा हर कातिल हैराँ मिलता है..!!
यह मुट्ठी भर हौंसला ही काफ़ी है., गर तू साथ रहे हमसफ़र
तू क्या जाने इस मुट्ठी भर मोहब्बत में ही., मुझे सारा जहाँ मिलता है..!!
तेरे साथ रहने या दूर रहने में फ़कत इतना फर्क है..,
कि तेरे साथ रास्ता घर., और बिन तेरे घर की जगह खाली मकाँ मिलता है..!!
यह आलम है मेरे इश्क की बेचारगी का..,
कि संग तुम्हारे वीराना भी बहार., और बिन तुम्हारे बहारा भी वीराँ मिलता है..!!!....

aapne sahi likha hai zindgi mein yahi hota hai aur yahi zindgi hoti hai...
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